Guru: The Key to a Life of Purpose and Fulfillment
दोस्तों आपने कबीर जी का एक दोहा अवश्य सुना होगा। अर्थात, गुरु और भगवान दोनों मेरे समक्ष खड़े है और मैं पहले गुरुदेव को प्रणाम करना चाहूंगा ईश्वर को नहीं क्यों? अंत में उन्होंने एक सूत्र दिया जिन गोविन्द दियो मिलाये अर्थात जिन गुरु ने गोविन्द से मिला दिया, ईश्वर से मिला दिया। ईश्वर तो सर्वत्र है ही हमारे भीतर भी ईश्वर है, कण-कण में ईश्वर है, आगे, पीछे, ऊपर, निचे तीनों लोको में, समस्त ब्रम्हांड में कौन सा ऐसा स्थान है जहा पर ईश्वर नहीं है।
लेकिन तब भी हम अपने आप को सदा अकेला क्यों पाते है अगर ईश्वर सब जगह है तो जब भी हमे कस्ट, दुःख, आपदा आती है तो क्यों ईश्वर साक्षात प्रघट होकर हमारी रक्षा नहीं करते है। सज्जनों, कबीर जी ने ऐसे ही गुरु को पहले प्रणाम करने का निर्णय नहीं लिया इसके पीछे कारण है। ईश्वर भले कण-कण में हो लेकिन जब तक ईश्वर आपको मिलते नहीं तब एक ईश्वर का आपको लाभ नहीं है।
इस बात को हम एक उदाहरण से समझते है आप बहुत गरीब है और एक कमरे में रह रहे है, ना खाने को भोजन, पहनने को वस्त्र और बीमार है इलाज के लिए पैसे नहीं है और मान लीजिये उस कमरे में जहा पर आप ज़मीन पर चादर बिछाकर सोते है उसी के निचे ज़मींन में खजाना पड़ा हो।
वह खजाना तो है लेकिन अगर वह खजाना आपको मिला ही नहीं तो क्या उस दबे हुए खजाने का आपको लाभ है आपकी गरीबी दूर होगी जाहिर सी बात है नहीं लेकिन अचानक आपके पास कोई भद्र पुरुष आता है वह व्यक्ति कहता है की भाई थोड़ा सा हटना तो और यहाँ से खुदाई कर के जहां तुम बैठे हो ठीक उसी के निचे खजाना है आओ मैं साथ में लगकर उसे खुदवाता हु और देखते ही देखते तुम अपार धन के मालिक हो जाओगे।
आप संदेह ना करे और एक बार उनकी बात मानते हुए आप यहाँ से खुदाई करे और क्या पाते है हिरे, जवाहरात धन सम्पदा से भर पूर्ण एक सुन्दर खजाना आपके हाथ लगता है। निश्चित ही आपकी गरीबी आपकी दरिद्रता वह खजाना ही दूर करेगा इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन जैसे ही एक तरफ खजान पड़ा है जो आपकी दरिद्रता को दूर करेगा और एक तरफ वह सज्जन पुरुष खड़ा है जिन्होंने वह खजाना आपको खनवाया आपको प्राप्त करवाया।
तो बताईये इस स्थिति में आप किसको प्रणाम करेंगे उस खजाने को जो था तो आपके ही घर में लेकिन कभी नहीं कहाँ की लो मैं स्वयं ज़मींन से निकलकर तुम्हारे समक्ष तुम्हारे झोली में आता हु और कर लो अपनी दरिद्रता का नाश। और दूसरी तरफ वह सज्जन है जो ना की आपके रिश्ते में है, ना पहचान में है बस मिले और कहा की लो यहाँ से खुदाई करते है और खजान लेते है बस खुदाई की और आपको खजाना दिलवा दिया तो आप किसको प्रणाम करेंगे पहले निश्चित है केवल प्रणाम ही नहीं आप उन सज्जन पुरुष के चरणों में फुट-फुट कर रोयेंगे बार-बार नमन करेंगे उनके चरण चूमेंगे की हे आदरणीय ये तो आप आये और मेरे समस्त कस्टो का निवारण कर डाला।
इसीलिए खजान होना बड़ी बात नहीं थी खजाने का पता लगना और उसका मिल जाना यह बड़ी बात थी इसलिए सज्जनो कबीर जी कहते है ईश्वर भी तो एक खजान ही है जो की हमारे शरीर के भीतर विदयमान था लेकिन तब भी हम सुख शांति रूपी सम्पदा से कोसो दूर थे और विकारों की मार झेलते हुए दुखो की दरिद्रता भोगे जा रहे थे।
यह तो गुरु की कृपा है की वे हमारे जीवन में आये और हमारे मस्तिष्क पर विद्यमान तीसरे नेत्र को खोलवाया और भीतर पड़ा खजाना जिसे हम ईश्वर कहते है वह लेकर हमारे ह्रदय रूपी झोली में डाल दिया और हमारे मोक्ष का मार्ग अस्सवत हो गया। जिनकी कृपा से यह सुन्दर मार्ग मिला वह गुरु ही हुए उन गुरु को भला कैसे पहले हम प्रणाम नहीं करेंगे। ना चाहते हुए भी बर्बस ऐसे पावन गुरुदेव के श्री चरणों में हमारा मष्तक नत हो ही जाता है फिर एक और उदाहरण देखिये।
आपको नदिया पार करनी है पार तो आपको नौका ही लेकर जाएगी और जिस वक्त आप नौका में बैठते है उस पार पहुंच जाते है तो निश्चित ही आप नौका में बैठकर पार हुए लेकिन जैसे ही आप पैसा देने लगे तो क्या आपने नौका को पैसे दिया की हे नौक ये लो बिस रुपये और आपका बड़ा धन्यवाद। आप ऐसा नहीं कहते आप मल्लाह को कहते है की हे मल्लाह आपका बहुत धन्यवाद और ये लीजिये उतरवाई और हमारी सेवा स्वीकार कीजिये।
यहाँ आपने नौका को पैसे नहीं दिए बल्कि मल्लाह को दिए क्यों क्योंकि बिना मल्लाह के नौका किसी काम का नहीं सज्जनों गुरु मल्लाह होता है और नौका ईश्वर है निश्चित ही ईश्वर पर सवार होकर हमें पार लगाना है लेकिन अगर गुरु रूपी मल्लाह नहीं होंगे तो नौका रूपी ईश्वर वह भी हमारी किसी काम की नहीं होंगी।
इसीलिए सज्जनों स्वतः ही हमारे मन में मल्लाह के प्रति विज्ञता का भाव आ जाता है एक और उदाहरण लेते है हम बीमार है स्वाभिक है की दवा ही हमको ठीक करेगी आप हॉस्पिटल जाते है तो क्या वहां पर पड़ी हुयी अनेको दवाईओ में कोई भी दवाई उठाकर खा लेते है जी नहीं !
ठीक तो आपको दवा ही करना है लेकिन उसके पहले आप किसे पास जाते है आप डॉक्टर के पास जाते है और डॉक्टर से कहते है की डॉक्टर साहब हमे ठीक कर दीजिये निश्चित ही ठीक तो दवा ही करेगी लेकिन आप कहते है की डॉक्टर साहब आप ठीक कर दीजिये और डॉक्टर आपको दवा देते है आप ठीक होते है और जैसे ही आप ठीक हुए आप धन्यवाद किसका करते है डॉक्टर की ना की दवाई की।
अर्थात दवा तो है ठीक भी दवा ही करेगी लेकिन बिना डॉक्टर के वह दवा आपके लिए मिटटी के समान है और बिना डॉक्टर के अगर आपने सीधे दवा लेना आरम्भ कर दिया तो हो सकता है की आप अधिक बीमार पड़ जाये। ईश्वर भी दवा है जो कि हमारी 84 लाख युवनियो की बीमारी का इलाज है। लेकिन क्योकि गुरु वैद्य है उनके बिना अगर आप कहेंगे की ईश्वर रूपी दवा आपको लाभ कर जाएगी तो यह भ्रम है। इसीलिए ग्रंथो में कहाँ..
मेरा बैध गुरु गोबिंदा
हर हर नाम औखद मुख देवै
काटे जम की फंदा
अर्थात मेरा वैध गुरु है और हरी के नाम की औषधि मुझको देता है और काटे जम की फंदा यम दूतो की फंडो को काट देता है बीमारी दूर कर देता है। इसीलिए सज्जनो गुरु खजान दिलवाने वाले वे सज्जन पुरुष है, नदियाँ पार करवाने वाले मल्लाह है और बीमारी ठीक करने वाले वैध है। जैसे बाहर मल्लाह या वैध को स्वतः ही आप प्रतिग्यता के भाव से समर्पित हो जाते है ठीक वैसे ही एक भक्त एक सिस्य गुरु को नमन करता है समर्पित होता है की हे गुरुदेव अगर आप ना होते तो ईश्वर भले ही मेरे चारो तरफ था लेकिन तब भी हम ईश्वर से सदा दूर ही रहते।
इसीलिए सज्जनो गुरु की महिमा उसकी अस्तुति उसकी कृपा यह अनंत है इसीलिए सदा प्राथना करें की हे गुरुदेव हम कही भी रहे लेकिन आपकी याद, आपका स्मरण, आपका प्रेम, आपका दुलार, स्नेह हम हर घडी मेहुश करें हर छड़ रोम रोम में ऐसे ही प्राथना करते हुए सज्जनो गुरुदेव को मन ही मन नमन करें और आपसे निवेदन है यह प्रसंग आपको अच्छा लगा हो तो कृपया अपने दोस्तों के शेयर जरूर करें।

